35 साल बाद

35 साल बाद
कल शाम दिल्ली में क्लास गेटटूगेदर में 8 लोग एकत्रित हुये। बहुत अच्छा लगा। कुछ से तो 35 साल बाद मुलाक़ात हुई। सब कुछ बदल चुका था, परन्तु एहसास वही थे।  इतने वर्षों बाद भी वही टिड्डी, घोया, चीनी, डंग, डमरू, मच्छर, झुर्री और पांडे। वही आर आर पांडे सर, सेठी सर, श्रीवास्तव सर, एगबर्ड सर…. । बातचीत में हम सब भूल गये थे कि, हमारे अपने बच्चे उस उम्र से कहीं बड़े हो चुके हैं। मस्ती में हमें पता नहीं चला कि कब 12 बज गये।
बातचीत के दौरान टिड्डी ने बताया कि 2 साल पहले उसकी एन्जियोप्लास्टी हो गई है। सभी को बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि जब टिड्डी आया था तो सभी ख़ुश हो गये थे कि टिड्डी अब टिड्डी नहीं रहा। परन्तु टिड्डी ने स्पष्ट किया कि जो कुछ भी हम देख रहे हैं वह मात्र बाहरी आवरण है, उसने ब्लेज़र के अंदर एक इनर, शर्ट और स्वेटर पहन रखा है। उसने यह भी बताया कि जब उसकी एन्जियोप्लास्टी हुई उस वक़्त वह अपनी यूनिट का सबसे तेज़ धावक था। वह प्रतिदिन 2-3 कि.मी. दौड़ने के साथ-साथ घंटे भर कसरत करता था। उसका खाना-पीना पूरी तरह सात्विक। बहुत ही नापतौल वाला जीवन और शरीर पर रत्ती भर फ़ैट नहीं। उसे कभी-कभी सीने में दर्द का तब एहसास होता था, जब वह अपने शरीर को झमता से अधिक थका देता था। उसने डॉक्टर को दिखाया, तो गहन जाँच का सिलसिला शुरू हो गया और होता भी क्यों नहीं, वह फ़ौज में ब्रिगेडियर जो था।
शुरूआती जाँच में कुछ नहीं निकला। सभी रिपोर्ट नार्मल थीं। फिर एन्जियोग्राफी में पता चला कि उसकी एक आर्टरी 80% ब्लॉक थी, अत: एन्जियोप्लास्टी कर दी गई। इससे आर्टरी तो खुल गई, परन्तु वह बची हुई ज़िन्दगी के लिये हार्ट पेशेन्ट बन गया। अब वह नियमित रूप से डॉक्टरों द्वारा सुझाई गई दवायें लेता है और समय-समय पर जाँच करवाता है। इसके कारण उसकी मेडिकल कैटेगरी डाउन हो गई है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव उसके कैरियर पर पड़ेगा।
यह सुनकर मुझे बहुत दु:ख और आश्चर्य हुआ। दु:ख इस बात का हुआ कि काश! लोग अपने शरीर का ऑंकलन स्वयं कर पाते और आश्चर्य हुआ आज की अबोध मेडिकल साइन्स पर। मुझे विश्वास हो चुका है कि, आज के मेडिकल विज्ञान में सोच समाप्त हो चुकी है। हर चीज़ एक रूढ़िवादी परंपरागत सिस्टम में ढल गई है।
मेरे अनुसार ऐसी परिस्थितियों में एन्जियोप्लास्टी करना किसी जघन्य अपराध से कम नहीं था। मैंने उसे बताया कि 80% या 100% आर्टरी ब्लॉकेज में भी उसे कभी भी हार्ट अटैक नहीं होता, क्योंकि जैसे-जैसे इधर आर्टरी ब्लॉक हो रही थी वैसे-वैसे दूसरी तरफ़ से कोलैटरल्स डेवलप हो रहे थे। यह सभी को ज्ञात है कि आवश्यकतानुसार  प्रकृति स्वयं रास्ता बनाती है। चूँकि उसके शरीर को अधिक रक्त संचार की आवश्यकता थी, अत: उसके हार्ट में कोलैटरल्स का विकास     तेज़ी से हुआ। इस कारण नार्मल कंडीशन में कोई समस्या नहीं होती थी। इस प्राकृतिक प्रक्रिया से पूरा जीवन बिना किसी हार्ट की समस्या से निकल जाता। परन्तु इस एन्जियोप्लास्टी के कारण बची हुई ज़िन्दगी में हार्ट अटैक की संभावना  बढ़ गई है। जो दवायें आज उसे दी जा रही हैं, क्या वे आर्टरी ब्लॉकेज या हार्ट अटैक से उसे बचा सकती हैं? और यदि उत्तर हाँ है तो उसकी एन्जियोप्लास्टी की क्या ज़रूरत थी। कोई इमर्जेंसी नहीं थी, कुछ समय थोड़ी भागदौड़ कम करता और जब दवाओं से आर्टरी क्लियर हो जाती तो भाग दौड़ कर लेता। परन्तु एन्जियोग्राफी ने उसे जीवन भर के लिये कमजोर बना दिया, अब वह उतनी भी भागदौड़ कभी नहीं कर पायेगा जितना इलाज के पहले कर सकता था। लेकिन दुनिया में सभी इसे ही इलाज कहते हैं। क्या विडंबना है?
एन्जियोप्लास्टी करने के कारण, पुन: उसी के आसपास आर्टरी ब्लॉक होने की संभावना बढ़ जाती है। इस तथ्य का प्रमाण अनगिनत केस से उजागर होता है। एन्जियोप्लास्टी के बाद पहले कि तरह दौड़ना-भागना तो दूर, नार्मल ज़िन्दगी भी जीना मुश्किल हो जाता है। जीवन में बहुत से प्रतिबंध लग जाते हैं और आदमी बची हुई ज़िन्दगी के लिये हार्ट का पेशेन्ट बन जाता है। इसके अतिरिक्त एन्जियोग्राफी के बाद बंद आर्टरी खुलने से रक्त की प्राकृतिक सप्लाई चेन खुल जाती है, फलस्वरूप इमर्जेंसी में विकसित कोलैटरल्स धीरे-धीरे काम बंद कर देते हैं क्योंकि उनकी आवश्यकता समाप्त हो चुकी होती है। कुछ समय बाद जब पुन: ब्लॉकेज शुरू होता है, तो कोलैटरल्स उस प्रकार नहीं विकसित होते जैसे पहले हुये थे। पर्याप्त कोलैटरल्स ना विकसित होने से हार्ट पर ज़ोर पड़ता है, जिससे हार्ट कमज़ोर पड़ने लगता है और हार्ट अटैक की संभावना बढ़ जाती है।अत: किसी भी परिस्थिति में स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारी एवं उचित विश्लेषण हेतु  सम्पर्क करें –

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