हमारा विश्वास ही हमारा भविष्य है – “THY FAITH IS THY DESTINY”

हमारा विश्वास ही हमारा भविष्य है – “THY FAITH IS THY DESTINY”

हाल में हुआ एक वाकिया, जो मुझे लिखने पर मजबूर कर गया। इसका उद्देश्य महज़ लोगों की मदद करना है, ना कि किसी पर ऊँगली उठाना।

 कुछ दिन पहले मेरे पास एक रोती सिसकती लड़की का अचानक फोन ? आया। लड़की ने मुझे बताया कि वह गर्भ से है और आठ महीनें पूरे हो गये हैं। परन्तु डॉक्टर ने उसे बताया कि उसका बच्चा 1.8 किलो का है और बढ़ नहीं रहा। उसने यह भी बताया कि बहुत समय से बच्चा बड़ा करने के लिये, डॉक्टर उसे खून पतला करने का इंजेक्शन भी दे रही थी। इसके अलावा डॉक्टर ने बताया है कि बच्चे की किडनी में सूजन आ रही है।  ऐसी स्थिति में स्वस्थ बच्चा होना संभव नहीं है।

मैंने उसे कहा कि रोना बंद करो और आश्वासन दिलाया कि अभी एक महीना है, तुम्हारा बच्चा स्वस्थ एवं कम से कम 2.5 किलो का होगा। दूसरा मैंने उसे बताया कि तुम्हें लडका होगा, क्योंकि जन्म के पहले टेस्टिस एक सुरक्षित स्थान पर अंदर ही रहती हैं। कई बार टेस्टिस के दबाव के कारण किडनी में सूजन का आभास होता है, जो जन्म के बाद कुछ ही दिनों में स्वत: ही समाप्त हो जाता है। हमने कुछ फूड सप्लीमेंट का सुझाव दिया, जिसे उन्होंने नियमित खाया।

  एक महीने बाद, उसने एक स्वस्थ 2.5 किलो के लडके को जन्म दिया। जैसे ईश्वर ने हमारी बात सुन ली हो। नार्मल डिलिवरी और दूसरे दिन शाम तक जच्चा-बच्चा घर वापस। परन्तु उसके बाद शायद डॉक्टर या फिर बच्चे की माँ को याद आया कि एक महीनें पहले किडनी में सूजन की बात हुई थी। फिर क्या था,  जच्चा-बच्चा पुन: अस्पताल में भर्ती। तत्काल बच्चे की लेजर सर्जरी प्लैन की गई। अस्पताल का लाखों का अतिरिक्त बिल बना।अच्छा दुकानदार आये हुये ग्राहक को निराश नहीं करता। अंदर की वास्तविकता तो ईश्वर ही जाने, परन्तु मुझे विश्वास है कि यह सब दो-चार दिनों में स्वत: ही ठीक हो जाता।

शायद यह अघिक जागरूकता और जीरो एरर सिंड्रोम के साथ-साथ माँ-बाप द्वारा अर्जित किताबी ग्यान का परिणाम है।

  आगे का हाल मुझे नहीं पता, क्योंकि बच्चे के जन्म के बाद उन्होंने मुझसे कोई सलाह लेना उचित नहीं समझा, हो सकता है कि उन्हें याद आ गया हो कि मैं डाक्टर नहीं हूँ।

इसके बिपरीत, इसी दौरान एक फोन ? बरेली से आया। उन्होंने बताया कि उनकी बहन को चौदह दिन पहले लड़का हुआ है।  जन्म से ही बच्चा आई सी यू में आक्सीजन पर है। पिछले चौदह दिनों में कोई सुधार नहीं है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि बच्चा बच भी गया तो नार्मल नहीं होगा। आक्सीजन हटा देते हैं, बच्चे को ले जाइये, अभी एक ही दिन का दुख होगा वर्ना पूरी जिन्दगी रोना पडेगा। आप लोग फैसला कर लो? क्या करें, समझ नहीं आ रहा,  आपकी सलाह चाहिये।

मैंने बच्चे की रिपोर्ट मंगवाई। रिपोर्ट देखकर लगा कि बच्चा बच सकता और पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है। मैंने उनसे कहा कि पहले आप डाक्टर की अनुमति ले लें। उसके बाद ही मेरे पास आयें। मैंने उन्हें जैसे ही बताया, अविलम्ब उन्होंने डॉक्टर की अनुमति मिलते ही दिल्ली आने का निर्णय कर लिया। अगले दिन रविवार की सुबह मैंने सिर्फ उनके लिये ही आफिस खोला था। मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि आप घूंटी के रूप में, बच्चे को कम से कम चार बार सप्लीमेंट दें। एक सप्ताह में बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो जायेगा। शाम को बरेली पहुँचते ही उन्होंने बच्चे को पूरे विश्वास के साथ, बताई हुई विधि से घूंटी देना शुरू कर दिया।  प्रतिदिन बच्चे में सुधार आता गया। चौथे दिन उसकी आक्सीजन हट गई। बच्चा अब पूरी तरह नार्मल है। परन्तु अपने अनुभव के अनुरूप डॉक्टर अभी भी उन्हें यही डरा रहें हैं कि बच्चा नार्मल नहीं है, जबकि आज के दिन बच्चा अपनी उम्र के बच्चों के मुकाबले हर एक्टिविटी में आगे है। मुझे विश्वास है कि यदि वे बच्चे को आगे भी मेरे सुझाव के अनुसार सप्लीमेंट देते रहेंगे तो बच्चा पूरी तरह नार्मल होगा और उसमें किसी प्रकार की कोई परेशानी की संभावना नहीं है। परन्तु विडंबना यह है कि आगे चलकर कहीं इन्हें भी जरूरत से अधिक जागरूकता ना आ जाये और इन्हें भी पता चल जाये कि मैं डाक्टर नहीं हूँ। वैसे इसकी संभावना कम है। परन्तु समय का कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि एक कहावत आपने भी सुनी होगी – “विनाश काले बिपरीत बुद्धि”।

एक समय था, जब डॉक्टर को भगवान के बाद दर्जा दिया जाता था, परन्तु अब डॉक्टरी महज एक व्यापार बन गया है। वैसे तो जीवन ही एक व्यापार है और हम सब भी व्यापार ही कर रहे हैं, परन्तु जब से मेडिकल प्रोफेशन व्यावसायीकरण हुआ है, इसमें नैतिकता समाप्त हो गई है। आजकल सभी लक्ष्य आधारित काम कर रहे हैं। किसी भी तरह लक्ष्य प्राप्त होना जरूरी है- साम-दाम-दंड-भेद।

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